श्री मांडू
ऋषि आश्रम का पुरातन इतिहास
द्वापर युग में महान तपस्वी महर्षि मांडू, खांडव्य वन में अपना आश्रम बनाकर तपस्या कर रह रहे थे। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद में गंगा तट पर स्थित मांडू आश्रम, ग्राम मवई ही वो स्थल है। उस समय इस क्षेत्र में राजा मंद्राचल का शासन था। राजा मंद्राचल एक न्यायप्रिय राजा थे और उनके राज्य में अपराधियों को कड़ा दण्ड दिया जाता था।
उस समय चोरो के एक समूह ने राजकोष में चोरी कर ली। वो चोर चोरी के धन को लेकर खांडव्य वन में छुपने के लिए आए। लेकिन राज सैनिक उनके पीछे लगे हुए थे। सैनिको से बचने के लिए उन चोरो ने चोरी का धन महर्षि मांडू के आश्रम में छुपा दिया। मांडू ऋषि अपनी तपस्या में लीन थे इसलिए उन्हे इसका आभास नहीं हो पाया।
राज सैनिक उन चोरो का पीछा करते हुए मांडू ऋषि के आश्रम में आए और चोरी के धन को वहाँ पाकर उन्होने मांडू ऋषि को ही चोर मानते हुए उन्हे राजा मंद्राचल के समक्ष लेकर आए। राजा मंद्राचल से ऋषि ने कहा कि इस चोरी के समान से उनका कोई संबंध नहीं है। उन्हे नहीं ज्ञात कि ये धन उनके आश्रम में कैसे आया?
तब राजा मंद्राचल ने मांडू ऋषि से कहा कि तुमने एक संत की वेषभूषा में चोरी जैसा अपराध किया है। इसलिए तुम्हें और भी कड़ा दण्ड दिया जाएगा। राजा ने सैनिको से मांडू ऋषि को सूली पर चढ़ा देने का आदेश दिया। मांडू ऋषि को सूली पर बैठा दिया गया, लेकिन सूली उनके शरीर को नहीं भेद पायी। मांडू ऋषि उस सूली पर ही अपनी तपस्या में लीन रहे। जब दो दिन बाद सैनिको ने देखा कि मांडू ऋषि को सूली भेद ही नहीं पायी है तो उन्होने ये समाचार राजा मंद्राचल को दिया। राजा मंद्राचल समझ गए कि ये कोई साधारण पुरुष नहीं हैं। राजा मंद्राचल तुरंत मांडू ऋषि के पास आए और उन्हे सूली पर से उतार कर उनसे उनका परिचय लिया और उनके चरणों में गिरकर अपने अपराध के लिए क्षमा मांगने लगे।
तब मांडू ऋषि ने राजा से कहा कि हे राजन तुम्हारा कोई अपराध नहीं तुमने जो भी किया वो परिस्थितिजन्य निर्णय था। आप तो अपने दायित्व का निर्वाह कर रहे थे। मैं तो अब धर्मराज से ही ये प्रश्न पूछूंगा कि मुझ जैसे सन्यासी को भी इस अपयश का भोग क्यों भोगना पड़ा?
तब महर्षि मांडू यमराज के पास गए और उनसे प्रश्न किया कि मेरे तपस्वी जीवन के बाद भी मुझपर ये मिथ्या आरोप क्यों लगा? तब यमराज ने कहा कि आप जब 4 वर्ष के थे तो आप छोटे-छोटे कीट-पतंगो को पकड़ कर उनमे तिनके चुभा देते थे। आपके उस पापकर्म का ही फ़ल आपको मिला है। इतना सुनकर ऋषि मांडू क्रोधित हो गए और यमराज से कहा कि 4 वर्ष की अल्पायु में किसी को भी पाप और पुण्य का भान नहीं होता है। अत: इतनी छोटी आयु में किए गए कृत्य का दण्ड देना उचित नहीं है। तब ऋषि मांडू ने ये विधान भी दिया कि 12 वर्ष की आयु तक किए गए किसी भी कृत्य को पाप या पुण्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। और फिर उन्होने यमराज को मृत्युलोक में जन्म लेने का श्राप दिया।
मांडू ऋषि के श्राप के कारण ही यमराज ने महाभारत काल में महात्मा विदुर के रूप में एक दासी के गर्भ से जन्म लिया।